Special Intensive Revision of Voter List in Bihar: बिहार के सुदूर इलाकों से लेकर छोटे गांवों तक इन दिनों एक ही आवाज गूंज रही है- “हमारे पास तो सिर्फ आधार है.” चुनाव आयोग द्वारा राज्य में मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान शुरू किए जाने के बाद यह वाक्य अब हजारों गरीब और वंचित तबके के लोगों की पहचान बन चुका है.
वेरिफिकेशन प्रक्रिया में केवल आधार कार्ड मान्य दस्तावेज नहीं
दरअसल, चुनाव आयोग की वेरिफिकेशन प्रक्रिया में अब केवल आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज नहीं माना जा रहा. आयोग का स्पष्ट कहना है कि केवल आधार के आधार पर मतदाता सूची में नाम बना रहना वैध नहीं है. इसके कारण बड़ी संख्या में ग्रामीण मतदाताओं को नोटिस मिल रहे हैं कि यदि वे अन्य आवश्यक दस्तावेज, जैसे- जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, शैक्षणिक प्रमाण पत्र, स्थायी निवास प्रमाण पत्र या अन्य जरूरी डॉक्यूमेंट में से कोई एक नहीं देते हैं तो उनका नाम सूची से हटा दिया जाएगा.
इस फैसले से गांवों में बेचैनी फैल गई है. एक ओर जहां गरीबी और अशिक्षा के कारण अधिकतर ग्रामीणों के पास केवल आधार कार्ड ही पहचान का प्रमुख साधन है, वहीं दूसरी ओर यह नई प्रणाली उनके मताधिकार को संकट में डाल रही है.

“हमारे पास कुछ नहीं, बस आधार है…”
कटिहार, मधुबनी, गया और भोजपुर जैसे जिलों में कई ग्रामीणों ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “हमने तो बैंक खाता, राशन कार्ड और यहां तक कि स्कूल में बच्चों का एडमिशन भी आधार से कराया. अब सरकार कह रही है कि यह कागज रद्दी है, तो हम क्या करें?” यह सवाल आज लाखों ऐसे नागरिकों के मन में है, जो पहले ही आर्थिक और सामाजिक रूप से हाशिये पर हैं.
राजनीतिक हलचल
इस मुद्दे पर विपक्ष भी आक्रामक हो गया है. तेजस्वी यादव ने सीधे तौर पर नीतीश सरकार और चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए कहा, “यह गरीबों और मजदूरों के मत का अधिकार छीनने की साजिश है. सरकार को इसपर तुरंत जवाब देना चाहिए.”

गांवों में “हमारे पास तो सिर्फ आधार” की गुहार सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस वर्ग की चिंता है, जिसकी आवाज अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुंचती. चुनाव आयोग को इस पर विशेष संज्ञान लेकर लचीला और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि हर नागरिक का मत सुरक्षित और सम्मानित रह सके.
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