Artificial Rain in Delhi: दिल्ली की जनता को जल्द ही तेज गर्मी और प्रदूषण से राहत मिलने की संभावना है, क्योंकि राजधानी में 4 जुलाई 2025 से कृत्रिम वर्षा (Artificial Rain) कराने की तैयारी जोरों पर है. यह पहल दिल्ली सरकार और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के संयुक्त प्रयास से होने जा रही है, जिसका उद्देश्य है- प्रदूषण पर काबू पाना और मानसून की कमी को संतुलित करना.
क्या है कृत्रिम वर्षा?
कृत्रिम वर्षा, जिसे तकनीकी रूप से क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding) कहा जाता है, एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है, जिसमें बादलों में कुछ विशेष रसायन जैसे- सिल्वर आयोडाइड, पोटेशियम आयोडाइड या नमक के कण डाले जाते हैं. ये कण बादलों के अंदर जलवाष्प को संघनित कर वर्षा उत्पन्न करने में सहायक होते हैं.
कैसे किया जाएगा यह प्रयोग?
IIT कानपुर की निगरानी में स्पेशल एयरक्राफ्ट और ड्रोन की मदद से दिल्ली-एनसीआर के ऊपर मौजूद बादलों में क्लाउड सीडिंग की जाएगी. यह प्रक्रिया पूरी तरह से सुरक्षित और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित है. कृत्रिम वर्षा के लिए आवश्यक है कि वातावरण में पर्याप्त नमी और बादल मौजूद हों, इसलिए IMD के साथ समन्वय कर मौसम की स्थिति पर भी नजर रखी जा रही है.

प्रदूषण पर कैसे पड़ेगा असर?
दिल्ली-NCR क्षेत्र में हर साल अक्टूबर से जनवरी के बीच प्रदूषण का स्तर खतरनाक हो जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि कृत्रिम वर्षा से हवा में फैले PM 2.5 और PM 10 जैसे कण जमीन पर बैठ जाएंगे, जिससे वायु की गुणवत्ता में तेजी से सुधार होगा. साथ ही, यह वर्षा क्षेत्र में तापमान में भी गिरावट लाएगी और लोगों को गर्मी से राहत मिलेगी.
क्या हैं संभावित चुनौतियां?
सफल क्लाउड सीडिंग के लिए उचित मौसमीय स्थितियां आवश्यक हैं.
यह प्रक्रिया महंगी है और हर क्षेत्र में इसका प्रभाव अलग-अलग हो सकता है.
तकनीकी गड़बड़ी या अपर्याप्त बादलों की स्थिति में यह प्रयास असफल भी हो सकता है.

दिल्ली में 4 से 11 जुलाई के बीच होने जा रहा यह कृत्रिम वर्षा अभियान एक प्रयोगात्मक, लेकिन आशाजनक पहल है. यदि यह सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में न सिर्फ दिल्ली, बल्कि अन्य महानगरों में भी प्रदूषण नियंत्रण और जल संकट से निपटने के लिए इसे एक मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है.
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